UP में कांग्रेस की घर वापसी, ब्राह्मण मुस्लिम, दलित चेहरे पर लगाया दांव
अजय राय हटे, आराधना मिश्रा बनीं यूपी कांग्रेस अध्यक्ष, इमरान मसूद को बड़ी जिम्मेदारी

अमित तिवारी
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने आखिरकार वो फैसला ले ही लिया जिसकी चर्चा पिछले 6 महीने से थी। पार्टी ने भूमिहार बिरादरी से आने वाले अजय राय को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर प्रतापगढ़ की रामपुर खास से विधायक आराधना मिश्रा मोना को नई प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है। उनके साथ सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। ( Congress Goes Back to Brahmin-Muslim-Dalit Formula to Counter BJP)
ये बदलाव छोटा नहीं है। कांग्रेस ने सीधा संदेश दिया है – हम वापस अपने 80 वाले फॉर्मूले पर जा रहे हैं। कांग्रेस ने इस बार एक-एक कुर्सी सोच-समझ कर बांटी है।
ये चार नाम क्यों अहम हैं?
पहला नाम – *आराधना मिश्रा मोना*। ये सिर्फ विधायक नहीं हैं। ये कांग्रेस के सबसे पुराने सिपाही प्रमोद तिवारी की बेटी हैं। प्रमोद तिवारी 9 बार उसी रामपुर खास सीट से जीते हैं, जिस पर अब उनकी बेटी लगातार तीसरी बार जीत रही है। ब्राह्मण समाज से आती हैं और महिला भी हैं। यूपी में रीता बहुगुणा जोशी के बाद इतने बड़े पद पर कोई ब्राह्मण महिला नहीं पहुंची थी।
दूसरा नाम – *इमरान मसूद*। पश्चिमी यूपी का सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा। सहारनपुर से सांसद हैं। उनकी जुबान और जनाधार दोनों के लिए जाने जाते हैं। उन्हें लाकर कांग्रेस ने 19% मुस्लिम वोट बैंक को सीधा मैसेज दिया है।
तीसरा और चौथा नाम – *देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद*। दोनों को सीनियर उपाध्यक्ष बनाया गया है। देवेंद्र निषाद निषाद समाज से हैं जो पूर्वांचल में 15-20 सीटों पर निर्णायक है, और आलोक प्रसाद दलित समाज से। ऊपर से प्रभारी पहले से ही दलित नेता *राजेंद्र पाल गौतम* हैं।
मतलब पूरी टीम देखो तो – ब्राह्मण, मुस्लिम, दलित, पिछड़ा। यही वो चार पिलर थे जिन पर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर में कांग्रेस की सरकार टिकी थी।
कांग्रेस का कोर वोटर टूटा कैसे था?
कभी यूपी में नारा चलता था – ब्राह्मण, बनिया, हरिजन और मुसलमान, यही हैं कांग्रेस की शान। लेकिन 1990 के बाद सब बिखर गया। मंडल कमीशन के बाद पिछड़ा वर्ग जनता दल और फिर सपा-बसपा में चला गया। बाबरी मस्जिद के बाद मुस्लिम सपा की तरफ चला गया। कांशीराम के आने के बाद दलित बसपा का हो गया और ब्राह्मण धीरे-धीरे भाजपा में शिफ्ट हो गया। नतीजा ये हुआ कि कांग्रेस 1989 के बाद कभी सत्ता में नहीं लौटी।
अब मौका कहां दिख रहा है कांग्रेस को?
पिछले एक साल में भाजपा के अपने सबसे मजबूत वोटर यानी सवर्ण समाज में नाराजगी की खबरें आ रही हैं। दो मुद्दे बड़े हैं। सवर्ण समाज को लगता है कि जिस भाजपा को वर्षों से राष्ट्र के नाम पर वोट देकर जिताते रहे, सत्ता मिलने के बाद वही हमारे साथ छल कर रही है।
एक है * यूजीसी और विश्वविद्यालयों में आरक्षण का नया रोस्टर*। सामान्य वर्ग के छात्रों को लग रहा है कि नौकरियों में उनके मौके कम हो रहे हैं।
दूसरा है *एससी-एसटी एक्ट*। जब सरकार ने इस कानून को और सख्त किया तो सवर्ण समाज में यह चर्चा तेज हुई कि इसका दुरुपयोग हो रहा है और भाजपा इस पर कुछ नहीं सुन रही।
यूपी की करीब 120 सीटों पर ब्राह्मण वोट हार-जीत तय करता है। भाजपा इस नाराजगी को जानती है और इसीलिए उसने भी कई ब्राह्मण चेहरों को आगे किया है। लेकिन कांग्रेस को लगता है कि यह सेंध लगाने का सही वक्त है। अगर ब्राह्मण वोट का 10-15% भी वापस आ गया और मुस्लिम-दलित वोट इंडिया गठबंधन में एकजुट रहा, तो 2027 में तस्वीर बदल सकती है।
तो क्या ये मास्टरस्ट्रोक है?
हां, लेकिन आसान नहीं है। अजय राय को हटाना भी रिस्क था। वे वाराणसी में मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ते रहे हैं और पूर्वांचल में भूमिहारों में उनकी पकड़ है। इसीलिए पार्टी ने उन्हें दिल्ली में बड़ी जिम्मेदारी देने की बात कही है।
और दूसरी बात, सिर्फ चेहरा बदलने से वोट नहीं आता। कांग्रेस को जमीन पर बूथ तक संगठन खड़ा करना होगा। आराधना मिश्रा और इमरान मसूद दोनों में एक बात कॉमन है – दोनों के अखिलेश यादव से निजी संबंध अच्छे हैं। इससे 2027 में सपा से सीटों के बंटवारे में कांग्रेस को फायदा मिल सकता है।
सीधी बात है – कांग्रेस ने तिजोरी से अपना सबसे पुराना हथियार निकाल लिया है। अब देखना है कि यूपी की जनता इसे कबूल करती है या फिर ये भी एक और प्रयोग बनकर रह जाएगा।




